गुरुजी के गांव नेमरा बना आस्था का तीर्थ : अविनाश देव

हजारों की भीड़, चार हेलीपैड और कुंभ जैसा नज़ारा; गरीब-मजलूमों के मसीहा गुरुजी रहेंगे सदैव जीवित

सच खबर, मेदिनीनगर। झारखंड सरकार के माटी कला बोर्ड के निवर्तमान सदस्य, युवा झामुमो नेता सह संत मरियम स्कूल के चेयरमैन अविनाश देव ने कहा कि उनके पिता स्वर्गीय सुदामा पंडित 90 के दशक से अंतिम सांस तक झामुमो के साथ जुड़े रहे। उस समय वे छोटे थे और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं का घर पर लगातार आना-जाना रहता था। रात तक मां लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती थीं, क्योंकि तब गैस का प्रचलन नहीं था, और सुबह-सवेरे पिता क्षेत्र में निकल जाते थे।

अविनाश देव ने बताया कि उस समय वे दिशोम गुरुजी शिबू सोरेन के संघर्ष को पूरी तरह नहीं समझते थे, लेकिन उनके पिता हमेशा बड़े आदर से गुरुजी का उल्लेख करते थे। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद ही गुरुजी के व्यक्तित्व और संघर्ष का असली अर्थ समझ आया। झामुमो में शामिल होने के बाद गुरुजी से मिलने और आशीर्वाद लेने का अवसर मिला। गुरुजी ने उनके माथे पर हाथ रखकर कहा, “तुम बहुत आगे बढ़ोगे”, जिससे उनके भीतर सिहरन दौड़ गई।

उन्होंने कहा कि गुरुजी के अस्वस्थ होने की खबर से वे बेहद दुखी हुए और 28 जून को हवाई मार्ग से दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उनसे मुलाकात की। लेकिन 4 अगस्त को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए। 5 अगस्त को विधानसभा में श्रद्धांजलि और अंतिम यात्रा का दृश्य अद्वितीय था—बरसात के बीच, पहाड़ों से घिरे नेमरा गांव में हजारों लोग मौजूद थे।

अविनाश देव ने बताया कि 11 अगस्त को भी नेमरा में अनुपम भीड़ रही। जगह-जगह बैरिकेड, चार हेलीपैड, चपरासी से लेकर आला अधिकारी तक, संथाल, कोल्हान, पलामू, छोटानागपुर से महिलाएं, बुजुर्ग, दिव्यांग और नौजवान, सभी गुरुजी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। पार्किंग दूर थी, लोग ई-रिक्शा से आ रहे थे, मानो नेमरा में कुंभ का मेला लग गया हो।

उन्होंने कहा कि गुरुजी को पेड़ा बेहद पसंद था और वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से आग्रह कर चुके हैं कि एक दिन इसे गुरुजी के नाम समर्पित किया जाए। आज की भीड़ देखकर लगता है कि गरीब-मजलूमों के मसीहा गुरुजी विचारों में सदैव जीवित रहेंगे। नेमरा अब गंगासागर, मक्का-मदीना, ननकाना साहिब और रोम की तरह एक तीर्थ बन चुका है, जहां गुरुजी के अनुयायी वर्ष में एक बार अवश्य आएंगे।

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